एक गांव में रमेश, सुरेश और दिनेश नाम के तीन भाई रहते थे। बचपन में ही इनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। तीनो भाई अपनी माता के साथ रहते थे। रमेश, सुरेश में और दिनेश में आपस में नहीं बनती थी, वे एक दूसरे से बहुत ही ज्यादा जलन रखते थे। फिर भी तीनों खेत में काम कर के अपने परिवार का भरण पोषण किया करते थे।
एक दिन उसकी मां बीमार पड़ी और अपने तीनों बेटों को बुलाकर बोली – “मेरे बच्चों! मेरा अब समय निकट आ गया है बहुत ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह पाऊंगी। इसलिए मैं चाहती हूं कि तुम लोग मिलकर एक अच्छा सा घर बनाओ और उसमें मिल कर रहो।”
मां के पास तीनों भाइयों ने हामी भर दी मगर बाहर आकर रमेश और सुरेश आपस में फुसफुसाने लगे कि हम लोग एक साथ नहीं रह सकते।
कुछ दिन बाद उनकी माता का मृत्यु हो गया। अब तीनों भाइयों ने सारे धन को तीन हिस्सों में बांट कर अपना अलग अलग घर बनाने का विचार बनाए। रमेश ने सोचा मैं घास फूस का घर बना लेता हूं और जो पैसे बच जाएंगे उसका मैं किसी और काम में उपयोग कर लूंगा। इसी तरह सुरेश ने लकड़ी का घर बनाने का निर्णय लिया। मगर दिनेश ने एक पक्के घर बनाने के लिए ईट एवं सीमेंट को खरीद लिया। जिसे खरीदने में उसका सारा पैसे लग गया। अब उसके पास पैसों की कमी आ गई। कुछ दिनों तक खेतों में काम करके दिनेश ने अपना एक पक्का मकान बनवा लिया।
कुछ समय बीता। एक दिन मौसम बिगड़ा और तूफान आ गया। तूफान में रमेश और सुरेश के घर उड़ गए क्योंकि उनका घर घास फूस और लकड़ियों का बना था, जबकि दिनेश का घर पक्की ईंटों से बना था और वह टस से मस नहीं हुआ। रमेश और सुरेश भागकर दिनेश धारा के घर आए। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था। अब तीनो भाई मिलकर एक ही घर में रहने लगे और खूब मेहनत करने लगे। इस तरह से उनकी मां का सपना साकार हुआ।