एक गांव के बगीचे में एक तालाब था, जिसमें बहुत सारे छोटे मोटे जलीय जीव जंतु रहते थे। उसमें एक मेंढक रहा करता था। मेढक को काफी दिनों से एक अच्छे दोस्त की तलाश थी, मगर उसे कोई अच्छा दोस्त मिल नहीं रहा था, जिसके साथ वह बैठकर बातें कर सके अपने मन की बातों को उस दोस्त को बता सके व उस दोस्त के साथ खूब सारा समय बिता सकें।

इन्हीं सब बातों से परेशान होकर एक मेढ़क तालाब के किनारे बैठा था। पास के ही एक पेड़ के नीचे एक बिल था। जिसमें एक चूहा रहता था । वह अपने बिल से बाहर आया और मेंढक के उदास होने का कारण पूछा।

मेंढक ने उसे अपनी सारी बात बताई। चूहे ने मेंढक की बातों को सुनकर कहा- ” सिर्फ इतनी सी बात के लिए परेशान होगी तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है! चलो आज से मैं तुम्हारा दोस्त रहूंगा। हम दोनों साथ में खेलेंगे और खूब बातें करेंगे।”

दोनों एक दूसरे के साथ बात करने लगे और रोज खूब देर तक एक साथ खेला करते थे। चूहे से मिलने के लिए मेंढक को तालाब से निकलकर बाहर आना पड़ता था।

कुछ दिन बाद मेंढक को यह बात बहुत बुरी लगने लगी। उसने चूहे को भी पानी में लाने के लिए एक उपाय बनाया। उस दुष्ट मेंढक ने चूहे से कहा- ” दोस्त! हम दोनों के पास एक दूसरे को बुलाने के लिए कोई साधन नहीं है! अतः मैं चाहता हूं की एक छोटी सी रस्सी तुम अपनी पूंछ में बांध लो और उसी रस्सी को मैं अपने पैर में बांध लेता हूं। जिसे भी जरूरत पड़ेगा वह रस्सी खींच लेगा और हम दोनों एक साथ मिल लिया करेंगे।”

उस नादान चूहे ने मेढ़क की बातों में आकर हामी भर दी। जैसे ही चूहे ने अपने पूछ में रस्सी बांधा मेंढक ने अपने पैर में रस्सी बांधकर पानी में छलांग लगा दिया। जिससे चूहा पानी में डूबने लगा और डूब कर मर गया।

ऊपर उठ रहे एक कौवे ने मरे हुए चूहे को पानी में तैरता हुआ देखा तो उसने उस मरे चूहे को खाने के लिए उठा लिया। जैसे ही कौवे ने चूहे को उठाया मेंढक भी उसके साथ रस्सी से बंधा था और वह भी चूहे के साथ उठ गया । अब कौवा दोनों को ले जाकर मारकर खा गया। अगर मेढ़क ने ऐसी दुष्टता ना की होती तो आज चूहा भी जिंदा रहता और वह भी।

इसलिए दोस्तों!! जो दूसरों का नुकसान करता है, उसे भी खुद नुकसान का सामना करना पड़ता है। इसलिए दुष्ट लोगों से कभी भी दोस्ती नहीं करनी चाहिए।

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